Saturday, January 1, 2022

नारी की बदलती दशा और दिशा

Seema Sandesh 01.01.2022

 नारी की बदलती दशा और दिशा


नारी की दशा और दिशा को लेकर सोशल मीडिया में तरह तरह के प्रसंग आते रहते हैं।  तंज भी कसे जाते है। आश्चर्य है कि महिलाओं को उपहास का केंद्रबिंदु बना दिया गया है।  महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी काबलियत साबित की है।  महिलाएं वह सब कुछ कर सकती है जो पुरुष कर सकते हैं। इसके अलावा वे मां भी बन सकती हैं।  मातृत्व नारीत्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।  यह हर महिला में एक सहज वृत्ति है।  यह मां होने की सहज प्रवृत्ति और क्षमता ही है जो महिलाओं को अद्भुत गुणों और कौशल से संपन्न करती है जैसे कि ममत्व, सहानुभूति और सहनशीलता।   


नारी कितने ही किरदार निभाती है। नारी माँ है, बहन है, बेटी है। जीवन में प्रेमिका है, पत्नी है। घर में बहु है, भाभी है, ननद है, सास है, अम्मी है, चाची है, ताई है, दादी है, भूआ है, मासी है, मामी है। स्कूल कॉलेज में सहपाठिन है अध्यापिका है। दफ्तर में सहकर्मी है, अधिकारी है। हस्पताल में नर्स और डॉक्टर है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में कर्मचारी है, बाबू है, मैनेजर है। राजनीति में पंच है, सरपंच है, विधायक है, सांसद है। सरकार में मंत्री है, जज है, अधिकारी है। पुलिस और सेना में भी अधिकारी और सैनिक है। शॉपिंग मॉल्स में कर्मी है, व्यापार की मालकिन है। खेत खलिआन  में कर्मी है, मज़दूर है। उद्योग में इंजीनियर है।  घर घर में काम करने वाली माई और आया है और फुटपाथ पर सब्जी बेचने वाली या रोटी सब्जी बनाने वाली मौसी है। कला के क्षेत्र में नृत्यांगना है संगीत और गान की कला में निपुन्न है। चित्रकार होने के साथ साथ चित्र भी है। चलचित्रों में हीरोइन है अदाकारा है। कुछ कार्य तो केवल महिला के नाम पर ही हैं: जैसे नर्स, आया, हाउस मेड, एयर होस्टेस इत्यादि।  देखा जाए तो नारी समाज का अभिन्न अंग है, समाज का आधार है। 


फिर नारी को लेकर समाज में इतनी विसंगति क्यों? मायके में लड़की को लड़कों से कम आंकना, दाज दहेज के कारण बोझ समझना, भ्रूण हत्या तक कर देना। ससुराल में नारी की प्रताड़ना और मार पीट, पर्दा, सास बहू के झगड़े, भाभी ननद के झगड़े, जेठानी, देवरानी की ऊहा पूह, देवर, जेठ, ससुर की छेड़ छाड़। समाज में लड़कियों और नारियों से छेड़ छाड़ और शोषण। यहां तक कि अकेली नारी का समाज में रहना भी दूभर है। और समाज ने तो नारी को वैश्या तक बना दिया। साहिर लुधियानवी को कहना पड़ा, "औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया। जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा धुत्कार दिया। नंगी नचवाई जाती है, ऐय्याशों के दरबारों में.  ये वो बेइज्ज़त चीज़ है जो, बंट जाती है इज्ज़तदारों में।" 


गुरु नानक देव ने कहा था कि उस को बुरा क्यों कहें जिस ने राजा महाराजा, संतो और महापुरुषों को जन्म दिया। नारी जननी है। बच्चे को नौ महीने कोख में रख कर जो नारी के व्यक्तित्व में वात्सल्य रूपी प्रेम प्रफुलित होता है उस का मर्द अंदाजा भी नहीं लगा सकता।  


नारी प्रेम का रूप है। नारी गृहस्थ का आधार है।  नारी गृह की लक्ष्मी है। मनुसमृति में ज़िक्र है 


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः 

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः 

।। मनुस्मृति ३/५६ ।।


यत्र तु नार्यः पूज्यन्ते तत्र देवताः रमन्ते, यत्र तु एताः 

न पूज्यन्ते तत्र सर्वाः क्रियाः अफलाः (भवन्ति) ।


जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ नारी  का सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं। अगर नारी का एक आंसू भी गिरता है तो उस परिवार का पुण्य क्षीण हो जाता है। माँ से ज़्यादा पवित्र रिश्ता कोई नहीं है। इस लिए स्त्री का सम्मान माँ के रूप में होना चाहिए ।  बहन से ज़्यादा वत्सल कोई नहीं है।  बहन हमेशा भाई का भला ही चाहती है।  बहन हमेशा भाई से सच्चा प्रेम करती है।  उस की दीर्घ आयु की कामना करती है कि भाई  के घर में सुख शांति समृद्धि बनी रहे। तो बहन के रूप में नारी का सम्मान अनिवार्य है। और बेटी  कुल की लाज है। माता पिता की यह ज़िम्मेदारी है कि बेटी सुशिक्षित हो और सदाचारी हो।  इस से  ससुराल में उसका जीवन सहजता से व्यतीत होगा। 


विवाह में एक अन्य परिवार की नारी  व्यक्ति और परिवार के जीवन में आती है। यह गृहस्थ का आधार बनती है। तो परिवार की ज़िम्मेदारी बनती है कि विवाह सम्बंद से आई नारी  के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी उस की है जिस के साथ विवाह हुआ और साथ ही साथ उस परिवार का भी हिस्सा बनी।  तो गृहस्थ धर्म का वर्णन करते हुए नारी को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। जिस परिवार और समाज में नारी के सम्मान की रक्षा होती है वह हमेशा तरक्की करता है। 


जीवन का सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता पति-पत्नी का होता है। इस रिश्ते की डोर में ही परिवार के सारे रिश्ते पिरोए होते हैं। अगर यह  धागा टूट जाए तो समझिए परिवार और समाज बिखरने में देर नहीं लगेगी। परन्तु आज के दौर में दाम्पत्य जीवन  असंतुष्ट और अशांत है। और नारी  शादी विवाह के बंदन में आपने आप को बांधना ही नहीं चाहती ।  नारी विशेषतय परिवार के बंदन से मुक्त होना चाहती है क्योंकि परम्परागत परिवार में  भारत में कामकाजी महिलाएं के ऊपर अपने पति, भाइयों और पिता की तुलना में घर की जिम्मेदारियों का बोझ ज़्यादा रहता है।  कामकाजी महिलाएं अधिक संगठित होती हैं और अपने समय को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की कोशिश करती हैं और अपना समय इधर-उधर नहीं गंवाती।  घर और कार्यालय दोनों में जिम्मेदारी के साथ उन्हें मल्टीटास्किंग का लक्ष्य रखना होता है और अधिकतर सफल होती हैं।  कहते हैं कि व्यस्त प्राणि हर चीज के लिए समय निकाल लेता है। परन्तु अब वह पति, भाइयों और पिता से ज़्यादा सहयोग की अपेक्षा करती हैं जो प्राय उपलब्ध नहीं होता।  शायद इस लिए नारी को लेकर सोशल मीडिया पर उपहास की भरमार है।  निम्नलिखित पंक्तियाँ आधुनिक नारी की दशा का बयान करती हैं:


कामकाजी नारी  हड़बड़ी में निकलती हैं रोज सुबह घर से

आधे रास्ते में याद आता है सिलेंडर नीचे से बंद किया ही नहीं

उलझन में पड़ जाता है दिमाग

कहीं गीजर खुला तो नहीं रह गया

जल्दी में आधा सैंडविच छूटा रह जाता है टेबल पर

और फिर ऑफिस पहुँच कर 

पूछना नहीं भूलतीं बच्चों का हाल

सास ससुर की दवाई के बारे में


स्वामी विवेकानंद ने कहा था, महिलाओं को अपनी स्वयं की समस्याओं को अपने तरीके से हल करने की स्थिति में रखा जाना चाहिए। उनके लिए ऐसा कोई कुछ नही कर सकता है। न ही करना चाहिये। और हमारी भारतीय महिलाएं इसे दुनिया में अन्य किसी के समान ही करने में सक्षम हैं।” और आज की महिला ने आपना रास्ता आप चुनना शुरू कर दिया है।  इस के चलते समाज में नए नए विकल्प और समीकरण सामने आ रहे हैं। पढाई लिखाई में और नौकरी पेशा में आज की नारी मर्दों के मुकाबले बराबरी पर है। चले गए वह दिन जब नारी घर में बंधक मज़दूर की तरह काम करती थी।  अब वह पिता, भाई और पति से सहयोग की अपेक्षा करती है और सहयोग लेती भी है और देती भी है।  चले गए वह दिन जब नारी  घूंघट निकाल कर दुबक कर बैठी रहती थी और पति और ससुर का नाम तक नहीं लेती थी।  आज की सुशिक्षित नारी कंधे से कन्धा मिला कर घर और कामकाज के सब काम में बराबरी का हिस्सा निभाती है। माँ तो अभी भी नारी को ही बनना है परन्तु वह परिवार को चलाने के लिए पति को सहयोग देने के लिए मजबूर अवश्य करती है।  यह बात भी सही है कि आजकल की आर्थिक अवस्था में परिवार के संघठन पर बहुत बोझ है। संयुक्त परिवार तो लुप्तप्राय होते जा रहे है।  कई बार तो पति पत्नी भी अलग अलग रहने को मजबूर हैं क्योंकि पोस्टिंग ही अलग अलग शहर में है।  कई बार तो दोनों को एक साथ छुट्टी भी नहीं मिलती और दोनों मनोरंजन के लिए भी अलग अलग आपने आपने दोस्त मित्रों के साथ जाते हैं।  बहर हाल यह नए समाज के समीकरण हैं जिस में आज के नर नारी ने जीना सीख लिया है।  कई बार तो ऐसा भी देखने में आया है कि पति पत्नी एक दुसरे से छुट्टी लेकर अपनी अपनी मनपसंद की जगह जाकर कुछ दिन या महीने बिता कर आते हैं।  यही आज के समाज की दशा और दिशा है। भगवान् करे समाज बना रहे। 

सतीश कालरा, बैंगलोर 22.12. 2021