Saturday, January 1, 2022

नारी की बदलती दशा और दिशा

Seema Sandesh 01.01.2022

 नारी की बदलती दशा और दिशा


नारी की दशा और दिशा को लेकर सोशल मीडिया में तरह तरह के प्रसंग आते रहते हैं।  तंज भी कसे जाते है। आश्चर्य है कि महिलाओं को उपहास का केंद्रबिंदु बना दिया गया है।  महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपनी काबलियत साबित की है।  महिलाएं वह सब कुछ कर सकती है जो पुरुष कर सकते हैं। इसके अलावा वे मां भी बन सकती हैं।  मातृत्व नारीत्व की सर्वोच्च अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।  यह हर महिला में एक सहज वृत्ति है।  यह मां होने की सहज प्रवृत्ति और क्षमता ही है जो महिलाओं को अद्भुत गुणों और कौशल से संपन्न करती है जैसे कि ममत्व, सहानुभूति और सहनशीलता।   


नारी कितने ही किरदार निभाती है। नारी माँ है, बहन है, बेटी है। जीवन में प्रेमिका है, पत्नी है। घर में बहु है, भाभी है, ननद है, सास है, अम्मी है, चाची है, ताई है, दादी है, भूआ है, मासी है, मामी है। स्कूल कॉलेज में सहपाठिन है अध्यापिका है। दफ्तर में सहकर्मी है, अधिकारी है। हस्पताल में नर्स और डॉक्टर है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में कर्मचारी है, बाबू है, मैनेजर है। राजनीति में पंच है, सरपंच है, विधायक है, सांसद है। सरकार में मंत्री है, जज है, अधिकारी है। पुलिस और सेना में भी अधिकारी और सैनिक है। शॉपिंग मॉल्स में कर्मी है, व्यापार की मालकिन है। खेत खलिआन  में कर्मी है, मज़दूर है। उद्योग में इंजीनियर है।  घर घर में काम करने वाली माई और आया है और फुटपाथ पर सब्जी बेचने वाली या रोटी सब्जी बनाने वाली मौसी है। कला के क्षेत्र में नृत्यांगना है संगीत और गान की कला में निपुन्न है। चित्रकार होने के साथ साथ चित्र भी है। चलचित्रों में हीरोइन है अदाकारा है। कुछ कार्य तो केवल महिला के नाम पर ही हैं: जैसे नर्स, आया, हाउस मेड, एयर होस्टेस इत्यादि।  देखा जाए तो नारी समाज का अभिन्न अंग है, समाज का आधार है। 


फिर नारी को लेकर समाज में इतनी विसंगति क्यों? मायके में लड़की को लड़कों से कम आंकना, दाज दहेज के कारण बोझ समझना, भ्रूण हत्या तक कर देना। ससुराल में नारी की प्रताड़ना और मार पीट, पर्दा, सास बहू के झगड़े, भाभी ननद के झगड़े, जेठानी, देवरानी की ऊहा पूह, देवर, जेठ, ससुर की छेड़ छाड़। समाज में लड़कियों और नारियों से छेड़ छाड़ और शोषण। यहां तक कि अकेली नारी का समाज में रहना भी दूभर है। और समाज ने तो नारी को वैश्या तक बना दिया। साहिर लुधियानवी को कहना पड़ा, "औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया। जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा धुत्कार दिया। नंगी नचवाई जाती है, ऐय्याशों के दरबारों में.  ये वो बेइज्ज़त चीज़ है जो, बंट जाती है इज्ज़तदारों में।" 


गुरु नानक देव ने कहा था कि उस को बुरा क्यों कहें जिस ने राजा महाराजा, संतो और महापुरुषों को जन्म दिया। नारी जननी है। बच्चे को नौ महीने कोख में रख कर जो नारी के व्यक्तित्व में वात्सल्य रूपी प्रेम प्रफुलित होता है उस का मर्द अंदाजा भी नहीं लगा सकता।  


नारी प्रेम का रूप है। नारी गृहस्थ का आधार है।  नारी गृह की लक्ष्मी है। मनुसमृति में ज़िक्र है 


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः 

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः 

।। मनुस्मृति ३/५६ ।।


यत्र तु नार्यः पूज्यन्ते तत्र देवताः रमन्ते, यत्र तु एताः 

न पूज्यन्ते तत्र सर्वाः क्रियाः अफलाः (भवन्ति) ।


जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं और जहाँ नारी  का सम्मान नही होता है वहाँ किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं। अगर नारी का एक आंसू भी गिरता है तो उस परिवार का पुण्य क्षीण हो जाता है। माँ से ज़्यादा पवित्र रिश्ता कोई नहीं है। इस लिए स्त्री का सम्मान माँ के रूप में होना चाहिए ।  बहन से ज़्यादा वत्सल कोई नहीं है।  बहन हमेशा भाई का भला ही चाहती है।  बहन हमेशा भाई से सच्चा प्रेम करती है।  उस की दीर्घ आयु की कामना करती है कि भाई  के घर में सुख शांति समृद्धि बनी रहे। तो बहन के रूप में नारी का सम्मान अनिवार्य है। और बेटी  कुल की लाज है। माता पिता की यह ज़िम्मेदारी है कि बेटी सुशिक्षित हो और सदाचारी हो।  इस से  ससुराल में उसका जीवन सहजता से व्यतीत होगा। 


विवाह में एक अन्य परिवार की नारी  व्यक्ति और परिवार के जीवन में आती है। यह गृहस्थ का आधार बनती है। तो परिवार की ज़िम्मेदारी बनती है कि विवाह सम्बंद से आई नारी  के पालन पोषण की ज़िम्मेदारी उस की है जिस के साथ विवाह हुआ और साथ ही साथ उस परिवार का भी हिस्सा बनी।  तो गृहस्थ धर्म का वर्णन करते हुए नारी को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। जिस परिवार और समाज में नारी के सम्मान की रक्षा होती है वह हमेशा तरक्की करता है। 


जीवन का सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता पति-पत्नी का होता है। इस रिश्ते की डोर में ही परिवार के सारे रिश्ते पिरोए होते हैं। अगर यह  धागा टूट जाए तो समझिए परिवार और समाज बिखरने में देर नहीं लगेगी। परन्तु आज के दौर में दाम्पत्य जीवन  असंतुष्ट और अशांत है। और नारी  शादी विवाह के बंदन में आपने आप को बांधना ही नहीं चाहती ।  नारी विशेषतय परिवार के बंदन से मुक्त होना चाहती है क्योंकि परम्परागत परिवार में  भारत में कामकाजी महिलाएं के ऊपर अपने पति, भाइयों और पिता की तुलना में घर की जिम्मेदारियों का बोझ ज़्यादा रहता है।  कामकाजी महिलाएं अधिक संगठित होती हैं और अपने समय को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की कोशिश करती हैं और अपना समय इधर-उधर नहीं गंवाती।  घर और कार्यालय दोनों में जिम्मेदारी के साथ उन्हें मल्टीटास्किंग का लक्ष्य रखना होता है और अधिकतर सफल होती हैं।  कहते हैं कि व्यस्त प्राणि हर चीज के लिए समय निकाल लेता है। परन्तु अब वह पति, भाइयों और पिता से ज़्यादा सहयोग की अपेक्षा करती हैं जो प्राय उपलब्ध नहीं होता।  शायद इस लिए नारी को लेकर सोशल मीडिया पर उपहास की भरमार है।  निम्नलिखित पंक्तियाँ आधुनिक नारी की दशा का बयान करती हैं:


कामकाजी नारी  हड़बड़ी में निकलती हैं रोज सुबह घर से

आधे रास्ते में याद आता है सिलेंडर नीचे से बंद किया ही नहीं

उलझन में पड़ जाता है दिमाग

कहीं गीजर खुला तो नहीं रह गया

जल्दी में आधा सैंडविच छूटा रह जाता है टेबल पर

और फिर ऑफिस पहुँच कर 

पूछना नहीं भूलतीं बच्चों का हाल

सास ससुर की दवाई के बारे में


स्वामी विवेकानंद ने कहा था, महिलाओं को अपनी स्वयं की समस्याओं को अपने तरीके से हल करने की स्थिति में रखा जाना चाहिए। उनके लिए ऐसा कोई कुछ नही कर सकता है। न ही करना चाहिये। और हमारी भारतीय महिलाएं इसे दुनिया में अन्य किसी के समान ही करने में सक्षम हैं।” और आज की महिला ने आपना रास्ता आप चुनना शुरू कर दिया है।  इस के चलते समाज में नए नए विकल्प और समीकरण सामने आ रहे हैं। पढाई लिखाई में और नौकरी पेशा में आज की नारी मर्दों के मुकाबले बराबरी पर है। चले गए वह दिन जब नारी घर में बंधक मज़दूर की तरह काम करती थी।  अब वह पिता, भाई और पति से सहयोग की अपेक्षा करती है और सहयोग लेती भी है और देती भी है।  चले गए वह दिन जब नारी  घूंघट निकाल कर दुबक कर बैठी रहती थी और पति और ससुर का नाम तक नहीं लेती थी।  आज की सुशिक्षित नारी कंधे से कन्धा मिला कर घर और कामकाज के सब काम में बराबरी का हिस्सा निभाती है। माँ तो अभी भी नारी को ही बनना है परन्तु वह परिवार को चलाने के लिए पति को सहयोग देने के लिए मजबूर अवश्य करती है।  यह बात भी सही है कि आजकल की आर्थिक अवस्था में परिवार के संघठन पर बहुत बोझ है। संयुक्त परिवार तो लुप्तप्राय होते जा रहे है।  कई बार तो पति पत्नी भी अलग अलग रहने को मजबूर हैं क्योंकि पोस्टिंग ही अलग अलग शहर में है।  कई बार तो दोनों को एक साथ छुट्टी भी नहीं मिलती और दोनों मनोरंजन के लिए भी अलग अलग आपने आपने दोस्त मित्रों के साथ जाते हैं।  बहर हाल यह नए समाज के समीकरण हैं जिस में आज के नर नारी ने जीना सीख लिया है।  कई बार तो ऐसा भी देखने में आया है कि पति पत्नी एक दुसरे से छुट्टी लेकर अपनी अपनी मनपसंद की जगह जाकर कुछ दिन या महीने बिता कर आते हैं।  यही आज के समाज की दशा और दिशा है। भगवान् करे समाज बना रहे। 

सतीश कालरा, बैंगलोर 22.12. 2021




Tuesday, August 4, 2020

कौविड का कहर

गत 6-7 महीने से COVID -19 अथवा CORONA  नामक महामारी ने विश्व भर में एक अदभुद डर का माहौल पैदा कर दिया है। दिसंबर 2019 में चीन के  वूहान प्रदेश में इस से काफी लोग प्रभावित हुए।  उस के पश्चात 10 जनवरी 2020 से विश्व के बाकी देश  प्रभावित होने लगे। इटली, जर्मनी, इंग्लैंड  जैसे देश इस की चपेट में आये। फिर अमरीका और ब्राज़ील भी बुरी तरह से फसे। 30 जनवरी से WHO ने इसे महामारी घोषित कर दिया।    आजकल भारत में भी इस की  दहशत है।  भारत में आज तक  (जुलाई 2020 तक) 15  लाख लोग संक्रमित पाए गए और लगभग 50000 लोग मर गए है।  24 मार्च 2020 को  देश के प्रधान मंत्री श्री नरिंदर मोदी ने सारे देश में 24 दिन का Lockdown कर दिया जिस से सब गतिविधियाँ ठप हो गयीं । बाजार बंद, यातायात बंद, रेल, बस, टैक्सी, हवाई यात्रा सब बंद. जो जहाँ था  वहीँ फँस गया।   कोई दुकान नहीं खुली, Shopping Malls बंद;  स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी सब शिक्षण  संस्थान बंद; कई बच्चे आपने घर नहीं जा  पाए।   यह सब उस वक़्त हुआ जब देश में प्रभावित लोग मात्र 500 थे। 14 अप्रैल को Lockdown 31 मई तक बड़ा दिया गया।  देश की अर्थ व्यवस्था पर काफी असर हुआ है।देश के महानगरों से असंख्य मज़दूर बेरोज़गारी से परेशान  दूर दराज़ आपने आपने गाँव की तरफ निकल पड़े। पहले तो उन्हें पुलिस ने मार पीट की क्योंकि वह Lockdown का उलंगन कर रहे थे।  परन्तु वो तो इतना बड़ा जनसैलाभ था की थामे नहीं थमा।   आखिर सरकार को कुछ सुविधा देनी पड़ी। 

धीरे धीरे परन्तु निरंतर ढंग से महामारी की चपेट में  लोग आते  रहे।  मार्च 2020 में 500-600 लोग संक्रमित थे और वर्तमान में यह संख्या बढ़कर 15  लाख तक पहुँच गयी है।  अभी तक इस का कोई पक्का इलाज सामने नहीं आया।  सरकार अब समझ चुकी है कि  Lockdown को और बढ़ाया नहीं जा सकता। लोग lockdown से मरें  ना मरें;  बेरोज़गारी से चरमरा जाएँगे ।   इस लिए कुछ सावधानियां बरतने को कहा गया है।  यानि  जितना हो सके घर में रहें। घर से बहार निकलें तो Mask पहन कर निकले। अन्य लोगों से कम  से कम एक मीटर की दूरी बना कर रखें। इत्यादि इत्यादि।  गत    4-5  महीने से रोज़, सुबह शाम मुख्य समाचार यही है कि  कोरोना से कितने लोग प्रभावित हैं, कितने ठीक हो गए, कितने मर गये । 

जब तक कोई व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित नहीं होता तब तक यह सब तो संख्या ही मालूम पड़ती है। परन्तु इस की गंभीरता  का तब पता चलता है जब कोई खुद प्रभावित होता है अथवा सगे सम्बन्धिओं  में / पड़ोस में / मित्र मंडली में कोई प्रभावित होता है।  वैसे तो काफी लोग ठीक हो रहे हैं. मरने वालों की संख्या मात्र 3% है। ज़्यादातर मरते वह हैं जो 60 वर्ष की आयु से ऊपर हैं या 10 वर्ष की आयु से काम हैं या पहले से किसी रोग से प्रभावित हैं। जैसे कि  शुगर , blood pressure / दिल का रोग इत्यादि। परन्तु जो मरते हैं बुरी तरह से मरते हैं।  उन्हें  सांस लेना मुश्किल हो जाता है।  फिर जो मरता है उस की लाश को कोई हाथ लगाने को तैयार  नहीं होता।  घर वाले ही पीछे हट जाते हैं।  डर यह लगता है कि संपर्क से infection न पकड़ ले।  इस लिए अस्पताल में भी पूरी तरह से सावधानी बरती जा रही है. डॉक्टर और नर्सें मुँह सिर  ढक कर मरीज़ के पास जाते हैं। जो मरीज़ के संपर्क में आ जाए तो उस को भी अलग जगह रहने को कहा जाता है।  

हाल ही में  हमारे पड़ोस में एक बज़ुर्ग की Corona के कारण मृत्यु हो गयी। जाहिर है उन के परिवार के सब सदस्यों को Self-Isolation में रहने को कहा गया। जिस दफ्तर में उन का बेटा काम करता था उन को भी आइसोलेशन में जाने को कहा गया।  जहाँ  पर वह बैडमिंटन खेलता था उनको भी आइसोलेशन में जाने को कहा गया।  मामला चलते चलते हमारे परिवार तक आ पहुंचा क्योंकि मेरा बेटा  उस के साथ बैडमिंटन खेलता है जिस के दफ्तर में उस का बेटा  काम करता है जिस के पिता की कोविड के कारण मृत्यु हुई।  मैं कहीं दूर तक मृतक के परिवार के संपर्क के घेरे में संभावित नहीं था। परन्तु हमारे पूरे परिवार को सेल्फ आइसोलेशन में रहने का सन्देश मिला। मुझे रात के 11 बजे सन्देश दिया गया सेल्फ-आइसोलेशन के लिए।  सेल्फ आइसोलेशन का सन्देश क्या आया मुझे थोड़ा सा बुखार भी हो गया। और शक हुआ कि आखिर  मुझे भी कहीं COVID तो नहीं !!

मैंने सोचा अब तो बारी आ गयी क्यों कि  मैं तो हूँ भी 67 वर्ष का और पत्नी भी। रात का समय। नींद आ नहीं रही। अभी अस्पताल जा नहीं सकते।  क्या  यह सचमुच COVID  ही है।  ऐसे लगा कि जैसे मौत के साथ सामना हो रहा है। । मौत का एहसास। मन में तरह तरह के विचार आने लगे। जो जो विचार मन में आये वह सांझे कर रहाँ  हूँ।  

 याद आया कि  गीता में लिखा है कि "जो पुरुष अन्तकाल में भगवान् को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह मेरे साक्षात रू को प्राप्त होता है - इस में कोई संशय नहीं।" (भगवद गीता अध्याय 2 श्लोक 4) मतलब कि मुक्ति ही प्राप्त हो जाती है। तो भगवान् का नाम याद करना शुरू कर दिया जाए ।
फिर संशय आया क्या पता मैं ठीक से भगवान् का स्मरण कर रहा  हूँ या नहीं।  मन्त्रजाप करना है , या गीता का पाठ करना है  या Meditation  अथवा ध्यान में बैठना है या सत्संग कीर्तन करना है या ज्योत जलानी है  या हवन  यज्ञ करना है या केवल भगवान्  को केवल याद ही करना है।  अगर ऐसा है तो कौन से भगवान् को याद करना है।  अगर मरते समय पास में डॉक्टर सिख हो और नर्स ईसाई हो तो मैंने किस भगवान् को याद करना है।    इत्यादि इत्यादि।  या आपने ही हिन्दू देवी  देवता को ही याद करने से मुक्ति प्राप्त होगी।   
 मुक्ति अगर इतने सस्ते में  उपलब्ध है तो फिर सारी  उम्र भर पाप पुण्य का क्या डर?  कर्मों का खेल है क्या?  इस लिए लगता नहीं मात्र इस से मुक्ति प्राप्त हो जाए हालांकि इस को भी कर लेने में कोई हर्ज़ नहीं।  वैसे मरने के वक़्त परमात्मा उसी को याद आता है जिस ने सारी  उम्र इस याद को  बना रखा होगा।  याद आया कि  दो वर्ष पहले जब 90 वर्षीय पिता श्री मृत्यु के नज़दीक पहुंचे ICU में थे तो उन के हाथ में मैंने उनकी माला थमा दी थी।  रात को माला थमा कर आया था।  सुबह ही उनहों ने शरीर त्याग दिया था।  मुझे ऐसा लगा था की उनहोंने  गीता के अनुसार नाम स्मरण करते हुए प्राण त्यागे।  उन्हें ज़रूर मुक्ति प्राप्त हुई होगी।  परन्तु फिर भी पंडित जी ने बहुत से क्रियाकर्म करने को कहा था।  एक साल भर तक करते रहे थे। अभी भी हर साल पितृपक्ष में श्राद करने को कहा जाता है।  
कुछ भी हो।  शास्त्रों में लिखा है।  गुरु जी ने भी करने को कहा है।  कर लेना चाहिए।  मन्त्र, तन्त्र का ज्ञान नहीं है, पूजा पाठ की विधि ठीक गलत हो सकती है भगवान् का स्मरण कर उनसे किये कर्मो की क्षमा मांग कर समर्पण तो किया जा सकता है।  जब पैदा हुए थे तो माँ को समर्पित थे।  मरते समय भगवान् को समर्पित हो जाते हैं। वैसे भी  मृत शरीर को जलाने के बाद पंचभूत शरीर यहीं का यहीं पर रह जाना है जी।  मिट्टी मिट्टी में, जल वाष्पीकरण हो कर चला जाएगा और इन्हीं बादलों के साथ अठखेलियन करेगा। शरीर की ऊर्जा अग्नि के साथ और प्राण  पखेरू बन कर वायु मंडल में घुल जाएँ गे और मुट्ठी भर शरीर ने जो आकाश घेर रखा है यहीं का यहीं । परन्तु शरीर नहीं रहे गा।  मन बुद्धि चित्त और अहंकार शायद  तक हैं जब तक शरीर है।  बाद में इनका क्या? आत्मा अगर है तो परमात्मा का ही अंश है उसी में मिल जाए गी।  
परन्तु मुझे ध्यान आया कि  कुछ काम करने बाकी हैं।  Lockdown में एक दूकान से सामान खरीदते वक़्त 40 रुपए कम थे। उस को 40 रूपये देने हैं।  एक और दूकान दार से सामान  मंगवाया था  उस के 15800 रुपये देने हैं।   यह ना दिए तो मुक्ति कहाँ से मिलेगी।   फेसबुक/ व्हाट्सप्प  में कुछ ग्रुप में  एडमिन हूँ।  उन में भी कुछ इंतज़ाम कर जाऊँ।  
 फिर ध्यान आया कि  अपनी वसीयत भी तो लिख दूँ। मरणोपरांत बच्चे आपस में ना झपट लें।  परन्तु इस का ध्यान आते ही कुछ विचार आने लगे। बच्चे तो अब पढ़ लिख कर बड़े हो गए हैं।  आपने आप संभाले हुए है।  उन को मेरे चाँद पैसे टकों की क्या ज़रुरत है।  वैसे भी हम रूपए पैसे को क्यों बचा कर रखते हैं।  यह तो हमारे कर्म का फल है।  कर्मफल को संचित करने का मतलब है बन्दन।  और  यहाँ मैं तो मुक्ति प्राप्त करने का सोच रहा  हूँ।  

यही सब सोचते सोचते नींद आ गई।  सुबह उठा। शरीर देखा।   विध्यमान था। तापमान सही था। खिड़की खोली। पोह फट रही थी।  चिड़िआ चहचहा रही थी।  दूर से कोयल ने कुहू कुहू किया।  पपीहे ने पीहू पीहू किया।  पड़ोसी ने कहा आप प्रिवेंटिव क्वारंटाइन में हैं।  दूध सब्ज़ी ला देता हूँ।  मुझे सूर्य की उषणता उपलब्ध हुई, मंद मंद और सुगन्धित वायु चलने लगी, पक्षी चहचहा रहे हैं, भवरे गीत गा  रहे है, शरीर निरोगी है, परिवार साथ है, पडोसी सेवा कर रहे हैं।  मुझे  तो लगा स्वर्ग यहीं है यहीं है। मुझे खुद क्या करना है इस के बारे में सोचना चाहिए ना कि मृत्यु क्या है।  जीवन जीना है तो इस के बारे में सोचना है कि  इतनी ज़्यादा संख्या में जो मज़दूर बेघर हो गए हैं उन का दुःख दर्द कैसे काम करूँ। 

इतने में मालूम हुआ कि पड़ोस में दो परिवार COVID  ग्रस्त हो गए।  पास वाली परिसर में 10 लोग ग्रसित हैं।  BBC का न्यूज़ बुलेटिन लगाया।  संसार में COVID का कहर जारी है।  विश्व भर ने 31 जुलाई 2020  तक   17 लाख लोग 188  देशों में प्रभावित हो चुके हैं और 6. 82 लाख लोग इस से मर चुके हैं।  अभी तक इस का इलाज नहीं मिला।  गत 300 वर्ष से विज्ञान  और तकनीक की प्रगति से मानव  ऐसा महसूस कर रहा था कि उस ने प्रकृति पर विजय पा ली है। जो सुख सुविधाएं आज के युग में सामान्य मानव को उपलब्ध हैं वह आज से 300 वर्ष पूर्व राजा  महारजा को भी उपलब्ध नहीं थी।  परन्तु एक वायरस ने सब ठप कर दिया है।  सब सुख सुविधाएँ धरी की धरी रह गई हैं।  लोग आपने आपने घरों में बंद है।  अर्थव्यवस्थाएँ चरमरा रहीं हैं।  यातायात बंद या न्यूनतम हैं।  परन्तु प्राकृतिक सुधार नज़र आ रहा है।  आसमान साफ़ नीले रंग का दिखाई देता है।  नदिआँ  साफ़ हो गई हैं।  वायु का प्रदूषण कम हो गया है।  लोग घर से काम कर रहें है।  मुझे याद आ रहे है चार्ल्स डिकेन्स के वह शब्द जो उस ने थे Tale of Two Cities के शुरू में ही लिखे थे।  मुझे लगता है यह अभी भी सही हैं।  

It was the best of times, it was the worst of times, it was the age of wisdom, it was the age of foolishness, it was the epoch of belief, it was the epoch of incredulity, it was the season of Light, it was the season of Darkness, it was the spring of hope, it was the winter of despair, we had everything before us, we had nothing before us, we were all going direct to Heaven, we were all going direct the other way – in short, the period was so far like the present period, that some of its noisiest authorities insisted on its being received, for good or for evil, in the superlative degree of comparison only.

यानी यह समय सब पहले के समय से बेहतर है क्योंकि प्रदूषण काम हो रहा है।  परन्तु यह समय मानव इतहास का सब से चुन्नोतिपूर्ण समय भी है। 

-O-O-O-

Sunday, February 9, 2014

Innings in PNB 1977-2013

Dear Friends,

As per PNB (Officers) Service Regulations 1979 20 (3) (I)  I will cease to be in the service of the bank wef 31.03.2013 on attaining the age of superannuation. But I continue to be in the service of the Bank for limited purpose. The relationship with the bank which started with my grand father Late  Lala Amar Nath Kalra in Lahore in 1927 and continued by my father Shri Rattan Lal Kalra since 1947, Chacha ji Shri Krishan Lal Kalra since 1946 my cousin Mr Rakesh Kalra since 1972 and brother Mr Dinesh Kalra since 1976 is not severed immediately. I wish someone in the next generation takes the baton forward.

PNB is an institution to grow with. It gives livelihood to its employees. It gives loans to millions for their self employment. PNB has been Kamdhenu for three generations of Kalra's & six members. May this great institution continue to grow & provide employment to many more generations of not only Kalra's but also to many of my colleagues and other meritorious people.

This week on my superannuation I am r,eceiving many phone calls, SMS & posts on my facebook/linked in accounts. The good wishes are pouring in from all four corners of the country where this great bank gave me an opportunity to work & truly become an Indian with pan India experience. I am receiving good wishes from colleagues, clients, stake holders, Govt officials, NGO's and all kind of constituents in Micro, medium & corporate sectors which this great bank of ours gave me opportunity to interact & network with. It is indeed a noble profession to be a banker & more so in PNB.

I recall with nostalgia that I joined this bank with a batch of about 100 + colleagues as Management Trainee on 28.11.1977. This added so many permanent friends to life. Joining as a batch builds cadre loyalty and a kind of bonding which continues till date. I feel proudly privileged that two of our batch mates have risen to become Chairperson & Managing Directors: Mr RK Debey in Canara Bank & Ms Archana Bhargava in United Bank. The galaxy of General Managers since 2010 have been in the key Management positions in the bank.  

I personally was  honoured with empanelment as GM in 2010 but a lending decision taken by me put my promotion on hold & the pain continues. But I am honoured that this great bank of ours gave me opportunity to hold responsible positions as Vice Principal CSC (2001-02), as Regional Manager in Bathinda (2002-04), as Sr Regional Manager in Sriganganagar (2004-07), as Zonal Manager/ Circle Head in Northeast in Guwahti (2007-09) and as Circle Head Karnatka in Bangalore (2009-11). Posting as DGM Financial Inclusion gave opportunity to remain involved in policy making for this new ecosystem. I am also honoured that the bank recognised my performance and gave performance linked cash incentives for outstanding performance on four occasions ever since the launch of the scheme in 2008-09. 

I am beholden to the mentors I had in this bank. I recall with grateful ness Mr AN Mukherjee, Mr VS Vasan, Mr HO Parkash, Mr SK Uppal, Mr LD Adlakha, Mr Ramesh Lal, Mr RG Puri, MR SK Chawla,   Mr VN Saxena, Mr GS Asthana, Mr US Bhargava & Mr PL Khurana & Mr BP Chopra.  I have not worked directly with many Sr Officers but they have been Icons in the bank. Some of them I have ventured to emulate by studying their Management styles. Mr RV Shastri, Mr Prithvi Raj, Mr SK Awasthi, Mr RIS Sidhu, Mr BM Mittal,  Mr PK Mitra & Mr VK Sood just to  name a few. 

Posting as Zonal Manager gave opportunity to interact with the CMD's & ED's directly. Till that time I had only indirectly been observing the Management styles of top Management. Three CMD's had made landmark contributions to the bank to make it what it is today. Mr Parksh Tandon, Mr VS Varshney & Mr SS Kohli. Dr KC Chakrabarty gave it a vision & direction which he could not implement before he was elevated to become Deputy Governor RBI. The dream of the present CMD that Together we can Together we Will is taking its time to percolate down to the ground. But time will tell his contribution of making this bank neat & clean. As regards ED's I feel that they keep low profiles to tide over the period to become CMD's. Except that I found Mr DK Gupta, Mr Ramesh Lal & Mr Tanksale & Mr Nagehsh Payda to be gentlemen of metal. It will not be appropriate for me to comment on present team since my case is with them. I have all & profound respects for them. 

The professional journey in the bank gave ample opportunity to have peers who became life time friends: The list is really long but just to name a few Mr SK Arora, DGM CAD, Mr Anil Bhan, DGM Recovery HO, MR SK Popli, DGM GAD, Mr YP Issar, Ex GM, Mr SR Sharma, FGM Delhi, Mr Bl Patheja Mr Rajinder Mahajan, Mr GS Bhatia Mr SK Goyal Mr Ved Parkash . Many colleagues treat me as their mentor and have elated me time & again. The list is rather long. May be my skills as faculty member has helped them to have my perception as their Friend Philopspher & guide. I have personally recommended the names of many for their promotions & postings. Many of them have proved to be assets. Mr VK Sardana, DGM ZAO Jalandhar, Mr Lavleen Malhotra, DGM South Delhi, Mr PS Chauhan, DGM Bulandshar just to name a few. 

I have also remained closely associated with stalwarts in the trade union movement of the bank. Mr PR Mehta stood against the tide of time to make AIBEA a very strong force to reckon with. Our association happened to get cultivated when we worked sitting at desks next to each other in BO Chaura Bazar Ludhiana. Mr KD Khera has rejuvenated AIPNBOA from hibernation in 1976 and he has his own style to get the things done. He nurtured regional leaders but did not let anyone supersede him at the centre till recently. Mr AS Krishanan became personal friend when I inspected FEO Chennai in 90's. 

Lifelong association with spiritual organisations has been relished by me. inspire by my Spiritual Guru I got this inclination. My salute to that great soul. Then I remained associated with the Divine Life Society Rishikesh & Ramakrishna Mission to read Swami Vivekananda. Post superannuation I plan to remain closely associated with Art of Living. I am as of now going to settle in Bangalore next to the Art of Living Ashram on Kanakpura Road.This association is brought to me by my son Mr Himanshu Kalra who is an Investment Banker with Deutch Bank in London. I will also remain closely associated with a project with my son-in-law Mr Gaurav Batra who is involved in digitisation  of Education. His innovative skills has made it possible to make digital publications to learn the difficult lessons of Science easily with animation.  Shortly his company Nylytn Learning Systems Pvt Ltd will make mark in the sector. I am also planning to Start a Centre of Banking Excellance which I will like all to contribute. For this I will like to get associated with the Institute of Finance & international Management, Bangalore.

Should  you find me fit for anything it will be a great honour. My respected father Shri Rattan Lal Kalra (86), my wife Ms Rita Bajaj, my Son & daughter-in-law Supreetha & Himanshu Kalra, my daughter & son in law Mansi & Gaurav Bajaj join me in conveying our profound regards to all and place on record our thanx to this great organisation Punjab National Bank for what we are today.

Pl do remain in touch.

Thursday, July 3, 2008